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द्वाराहाट का इतिहास और प्रमुख मंदिर

द्वाराहाट का इतिहास और प्रमुख मंदिर - History of Dwarahat And Famous Temples of Dwarahat


द्वाराहाट, उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मंडल में जिला मुख्यालय अल्मोड़ा से 60 कि०मी० उत्तर पश्चिम में अवस्थित है। यह स्थल समुद्र तल से 1674 मीटर ऊंचाई पर स्थित है।द्वाराहाट अथवा 'द्वारहाट' उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले में स्थित है | यह रानीखेत से लगभग 21 किमी की दूरी पर स्थित है | 8वीं से 13वीं सदी तक के अनेक मंदिरों के अवशेष यहाँ से प्राप्त हुए हैं | द्वाराहाट के उत्तर में द्रोणागिरि (दुनागिरि) का प्रसिद्ध मंदिर है, जहाँ लोग मन्नत मांगते हैं। द्वाराहाट में हाट शब्द हट्ट का अपभ्रंश है, जिसका मतलब बाजार होता है। वर्तमान समय में वहाँ एक छोटा बाजार इस प्राचीन हाट शब्द की सार्थकता को सिद्ध भी करता है। जिसमें स्थानीय लोग और पर्यटक अपनी आवश्यकताओं की आपूर्ति हेतु खरीददारी करते हैं | 



History of Dwarahat And Famous Temples of Dwarahat





History of Dwarahat

द्वाराहाट में बहुत दूर तक पुराने नगर के चिन्ह मिलते हैं और मंदिरों की संख्या दर्जन के करीब होगी। ये मंदिर बिल्कुल खाली हैं। जिन मंदिरों में मूर्तियाँ हैं, वे भी बहुत कम मात्रा में तथा कुछ बची हुई, या टुटी हुई अवस्था में हैं । उत्तराखण्ड के अन्य स्थलों की भांति द्वाराहाट का भी प्रमाणिक इतिहास प्राप्त नहीं होता। उत्तराखण्ड में कत्यूरी राज्य का अभ्युदय पूर्व मध्यकाल में हुआ, जिसकी राजधानी जोशीमठ थी। जो कालान्तर में कुमाऊँ के कार्तिकेयपुर में स्थानान्तरित कर दी गई। कुमाऊँ का इतिहास रचने में सहायक ऐतिहासिक विवरण सातवीं सदी के अन्तिम भाग से प्राप्त होते हैं।


कत्यूरी कुमाऊँ के सर्वप्रथम ऐतिहासिक शासक मालूम पड़ते हैं जिनकी उपलब्धियों के कुछ प्रमाण आज भी मिलते हैं। लगभग 11 वीं शताब्दी में केन्द्रीय शक्ति के क्षीण हो जाने के कारण कत्यूरी साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया तथा यह द्वाराहाट, डोटी, सीरा जैसे क्षेत्रों में विभाजित हो गया | इन सभी से द्वाराहाट के कत्यूरी हमारे समक्ष महान निर्माता के रूप में प्रसिद्ध हैं। द्वाराहाट एवं इसके समीपवर्ती क्षेत्रों से प्राप्त अभिलेखों से निम्न राजाओं के होने की पुष्टि होती है |

गुर्जर देव, सुधार देव, मानदेव देव तथा सोमदेव




द्वाराहाट के प्रमुख मंदिर - Famous Temples of Dwarahat

द्वाराहाट में तीन वर्ग के मन्दिर हैं- कचहरी, मनिया तथा रत्नदेव। इसके अलावा बहुत-से मन्दिर प्रतिमाविहीन हैं। 'गूजरदेव का मन्दिर' द्वाराहाट का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मन्दिर है। कला की दृष्टि से यह मन्दिर उत्कृष्ट कहा जा सकता है | इस मन्दिर की चारों ओर की भित्तियों को कलापूर्ण शिलापट्टों से समलंकृत किया गया है । साथ ही द्वाराहाट का 'शीतला मंदिर' भी बहुत उल्लेखनीय है।


द्वाराहाट में गुर्जर देव ने अपने शासनकाल में एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। उत्तराखण्ड के समस्त मन्दिरों से अलग बाह्य अलंकरण के लिए यह मंदिर विशेष प्रसिद्ध है। पुरातात्विक रूप से , द्वाराहाट के 55 मंदिरों के समूह को 8 समूह में विभाजित किया जा सकता है | गुज्जर देव , कछारी देवल , मांडवे , रतन देवल , मृत्युंजय , बद्रीनाथ और केदारनाथ | 


यह अपने पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जाना जाता है | इस जगह में कई खूबसूरत और प्रसिद्ध मंदिर है एवम् इस स्थान को “मंदिरों का गाँव” भी कहा जाता है | 




मंदिर वास्तुशिल्प 

उत्तराखण्ड के अनेक जिलों में विभिन्न प्राचीन मंदिर फैले हुए हैं। इन मंदिरों का आरम्भिक काल छठी-सातवीं शताब्‍दी में रखा जा सकता है। मंदिर निर्माण की ये प्रक्रिया मध्य काल तक चलती रही। उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मण्डल के द्वाराहाट बाजार से लगभग एक किलोमीटर दूर द्वाराहाट गाँव में छ: मंदिर समूह स्थित हैं -

1. गूजर देवाल मंदिर

गूजर देवाल मंदिर का निर्माण गुर्जर देव ने अपने शासनकाल में करवाया था। बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी राजाओं के शासन काल में गूजर नामक वैश्य ने करवाया था। गूजर देवाल का निर्माण चबूतरे/जगती के ऊपर किया गया है। जगती में जाड्यकुम्भ, कर्णिका, पद् पपत्र, गजथर, नरथर का अलंकरण किया गया है। कुमाऊँ के देवालयों में गूजर देवाल के अतिरिक्त बालेश्वर सुग्रेश्वर (चंपावत) व कटारमल (अल्मोड़ा) में ही जगती प्रावधान है। ऊर्ध्वछंद योजना में अलंकृत जघा भाग है। 


नौटियाल के अनुसार जघा भाग में अंकित प्रतिमाएँ जैन शैली के अनुरूप दर्शायी गयी हैं। मंदिर के खण्डित शिखर को देखकर प्रतीत होता है कि यह उरूश्रृगों से युक्त रहा होगा। तलछंद योजना में गर्भगृह अंतराल व अर्धमंडल है। गर्भगृह प्रतिमा विहीन है। प्रवेश द्वार का उत्तरंग में सप्‍तमातृका का अंकन है। स्‍थापत्‍य की शैली से यह देवालय 14 वीं शताब्‍दी में निर्मित  प्रतीत होता है।


2. रतनदेव मंदिर समूह 

इस मंदिर में नौ मंदिर हैं। यह सभी देवालय रेखा शिखर शैली में निर्मित हैं। ऊर्ध्वछंद योजना में खुर, कुम्भ, कलश तथा कपोताली से अलंकृत वेदीबंध के ऊपर जंघा भाग निर्मित है। मंदिर का शुकनाश सादा एवं शिखर त्रिरथ है। शिखर के शीर्ष में ग्रीवा व आमलक हैं। कुछ मंदिरों में अर्द्धमंडप भी निर्मित हैं।




3. बद्रीनाथ मंदिर समूह

मंदिर के तलचंद योजना में गर्भगृह अंतराल एवं मंडप निर्मित है। ऊर्ध्वछंद योजना में वेदीबंध के ऊपर उद्गम युक्त रथिका से युक्त जंघा भाग है। कपोताली एवं अंतरपत्र युक्त वरण्डिका के ऊपर पंचरथ रेखा शिखर है। शिखर का कर्ण पाँच भूमि आमलकों से युक्त हैं। शुकनाश सादा है। उत्तरंग में चतुर्भुजी गणेश का अंकन किया गया है। गर्भगृह में चतुर्भुजी विष्णु की स्थानक प्रतिमा स्थापित है। बद्रीनाथ मंदिर के समीप दक्षिणाभिमुख लक्ष्मी मंदिर है। जो कि रेखा शिखर शैली में निर्मित है।


4. कचहरी मंदिर समूह 

यह मंदिर समूह 12 मंदिरों से युक्त हैं। तलछंद योजना में गर्भगृह, अतराल तथा अर्द्धमंडप निर्मित है। ऊर्ध्वछंद योजना में वेदीबंध, जंघा व शिखर निर्मित हैं। त्रिरथ शिखर के ऊपर आमलक व चन्द्रशिला स्थापित है। शुकनाश अधिकांश सादे हैं। गर्भगृह प्रतिमाविहिन है। अर्द्धमंडप चार स्तम्भों पर आधारित है। स्तंभ आधार अष्टकोणीय तथा ऊपर वृत्ताकार है। अर्द्धमंडप शीर्ष में प्रस्तर खण्डों से आच्छादित है। प्रवेशद्वार के उत्तरंग में गणेश का अंकन सामान्यत: किया गया है।




5. मनियान मंदिर समूह

वर्तमान में इस समूह के तीन मंदिर ही सुरक्षित अवस्था में हैं। रेखा शिखर शैली में निर्मित देवालयों के तलछंद योजना में गर्भगृह अतराल व अर्द्धमंडप एवं ऊर्ध्वछंद योजना में वेदीबंध, जघा व शिखर का प्रावधान है। प्रवेश द्वार के उत्तरंग में गणेश निर्मित किये गये हैं। मनियान मंदिर समूह के एक मंदिर के उत्तरंग में एक जैन तीर्थकर प्रतिमा का उल्लेख जैन द्वारा किया गया है।


6. मृत्युंजय मंदिर समूह 

इस समूह के मंदिरों में मृत्युंजय मंदिर ही अपने मूलरूप में है। अन्य मंदिरों के अवशेष मात्र प्राप्त होते हैं। तलछद योजना की दृष्टि से मृत्युंजय मंदिर गर्भगृह, अतराल तथा मंडप सभी वर्गाकार हैं। ऊर्ध्वछंद योजना में मंदिर की जगती का कुछ भाग जमीन में धसा है। मंदिर का जंघा भाग सादा व उसके ऊपर अंतर पत्र है, जो शिखर तथा जंघा को विभाजित कर रहा है। इस देवालय के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। पूर्वाभिमुख मंदिर का प्रवेशद्वार सादा है। तथा जिसके ललाट पर चतुर्भुजी गणेश की प्रतिमा उत्कीर्ण है। मंडप की बाहरी दायीं दीवार पर सात पंक्तियों का आरम्भिक देवनागरी लिपि में एक लेख अंकित है।



द्वाराहाट में स्थित ये मंदिर समूह केवल पूजा करने के स्थान ही नहीं थे वरन् ये सांस्कृतिक जीवन के भी केन्द्र थे। मंदिरों की स्थापना तथा निर्माण से केवल वातावरण ही परिवर्तित नहीं होता बल्कि आसपास की धार्मिक प्रवृत्तियों के जागरण में सहायता भी मिलती थी। मंदिर अपनी विशालता तथा दृढ़ता से उन विचारों को स्थायित्व प्रदान करता है जिसका उद्देश्य आदर्शो तथा मूल्यों की रक्षा करना था। जिस भू-भाग में मंदिर निर्मित होता है उस क्षेत्र में बसी जनता की धार्मिक गतिविधि वहीं केन्द्रित हो जाती है।



1 comment:

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