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Harela Festival of Uttarakhand 2019 in Hindi - Date, Images, Significance, Story & Celebration

Harela Festival of Uttarakhand 2019 in Hindi - Date, Images, Significance, Story & Celebration 

हरेला उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र का एक लोकप्रिय त्यौहार है जिसे बड़ी धूमधाम से प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है | हरेला का त्यौहार खेती से जुड़ा हुआ एक त्यौहार है जिसे ऐश्वर्य व समृद्धि का प्रतीक माना जाता है | हरेला का त्यौहार प्रत्येक वर्ष सावन माह के पहले दिन को मनाया जाता है | यह त्यौहार वर्षा ऋतु के आगमन को सूचित करता है | 


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Harela Festival date 2019 - हरेला पर्व मनाने की तिथि 

हरेला पर्व प्रत्येक वर्ष सावन माह के पहले दिन मनाया जाता है | इस वर्ष सावन माह 17 जुलाई से शुरू होगा | अतः हरेला का पर्व 17 जुलाई को पूरे कुमाऊँ क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जायेगा | 


Harela Festival - हरेला पर्व 

हरेला त्यौहार वर्ष भर में तीन बार आता है | अश्विनी और चैत्र के महीने में भी हरेला का त्यौहार आता है | उसके बाद हरेला का त्यौहार सावन के महीने में आता है | सावन के महीने में आने वाले हरेले के त्यौहार को 'सावन हरेला' के नाम से भी जाना जाता है | सावन हरेले का अत्यधिक महत्व होता है और इस हरेले को समूचे कुमाऊँ क्षेत्र में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है |


Harela Festival significance - हरेला पर्व की महत्ता 

हरेला त्योहार वर्षा ऋतु की नई फसल का प्रतीक है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में इस त्योहार का बड़ा महत्व है | इस दिन लोग पर्यावरण को बचाने के लिए एक-दूसरे को अधिक से अधिक पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं | हरेला पर्व परिवार की एकजुटता को भी प्रदर्शित करता है | यदि किसी परिवार का विभाजन भी हो जाता है या परिवार के कुछ सदस्य कहीं बाहर रहते हों तो भी हरेला केवल एक स्थान पर बोया जाता है तो इस तरह हरेला का यह अनोखा त्यौहार परिवार को एकजुट रखता है |





Harela Festival story -  हरेला पर्व की कहानी 

हरेला पर्व को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह दिवस के रूप में भी मनाया जाता है | ऐसी मान्यता है कि सावन माह के पहले दिन ही भगवान शिव और माता पार्वती विवाह सूत्र में बंधे थे और इस दिन को लोग उनके विवाह दिवस के रूप में मनाते हैं | लोग भगवान शिव और देवी पार्वती की मिट्टी की मूर्तियां बनाते हैं और उनकी पूजा करते हैं | भगवान शिव और देवी पार्वती की मिट्टी की मूर्तियों को डिकारे या डिकारों के रूप में जाना जाता है|


Harela Festival celebration - हरेला पर्व उत्सव 

हरेला पर्व के शुरू होने से ठीक 9 दिन पहले आषाढ़ के माह में एक टोकरी या किसी भी अन्य पात्र में अलग-अलग तरह के 5 से 7 अनाज जैसे गेहूं, जौं, सरसों, धान, उड़द, भट्ट आदि को बोया जाता है |  इसके बाद पात्र में प्रतिदिन पानी का छिड़काव किया जाता है | बीज से तैयार होने वाले पौधों को ही हरेला कहा जाता है | ऐसा माना जाता है कि ये पौधे जितने लम्बे होंगे उतनी ही अच्छी फसल होती है | हरेले के पर्व के दिन इन पौधों को काटकर ईश्वर के चरणों में समर्पित किया जाता है और पूजा की जाती है | ईश्वर से अच्छी फसल होने का आशीर्वाद माँगा जाता है | उसके बाद भगवान का आशीर्वाद समझकर कुछ तिनको को सिर पर और कान के पीछे भी रखा जाता है | इस पर्व के दिन उत्तराखंड के कई स्थानों पर मेले का आयोजन भी किया जाता है और तरह तरह के व्यंजन तैयार किये जाते है और इन पकवानो को लोगों में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है |




Harela Festival Song / Poem - हरेला पर्व की कविता / गाना 

हरेला के पर्व के दिन घर के सभी सदस्य अपने बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं | घर की कुंवारी लड़कियां रोली का टीका सबको लगाती हैं जिसके फलस्वरूप उसे आशीर्वाद के रूप में कुछ पैसे दिए जाते हैं | बच्चों को आशीर्वाद देते समय वे निम्नलिखित पंक्तियाँ गुनगुनाते हैं -


''जी रये, जागि रये, तिष्टिये, पनपिये 
दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस बइए
हिमाल में ह्युं छन तक, गंग ज्यूँ में पाणि छन तक 
यो दिन और यो मास भैटणै रये 
अगासाक चार उकाव है जये, धरती चार चकाव है जये 
स्याव जस बुद्धि हो, स्यु जस पराण हो
जौं सिल पीसी भात खाया 
जांठि टेकि भर जया, दुब जस फेलि जया"


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